वैक्सीन को लेकर फैल रही भ्रांतियों का विश्लेषण

पंकज कुमार सिंह:-
पिछले महीने भर से प्रतिदिन ही कहीं न कहीं से खबर आती है कि लोगों ने टीका लगाने गए स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मारपीट की,उन्हें भगा दिया। वे टीका लगवाना नहीं चाहते... 
    दूसरी ओर का सत्य यह है कि हजारों, लाखों, करोड़ों लोग रोज कतार में खड़े प्रतीक्षा कर रहे हैं कि हमें कब मिलेगी वैक्सीन! असँख्य अपना पैसा खर्च करने को भी तैयार हैं, पर वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध कैसे हो, वैक्सीन तो उनके पास पहुँच रही है जो लेना ही नहीं चाहते।
    मैं चाह कर भी नहीं समझ पाता कि जो लोग टीका लेना नहीं चाहते, सरकार उनके पीछे अपनी ऊर्जा क्यों खर्च कर रही है! क्यों नहीं उन लोगों को लास्ट के लिए छोड़ दिया जाता? देश के अन्य लोग आवश्यक नहीं है क्या?
    एक बहुत बड़ी जनसंख्या है जो टीका लगवाना नहीं चाहती। उसे सरकार पर भरोसा नहीं है, ना ही वे सरकार को अपना समझते हैं। मोदी हों या मनमोहन, वे मान ही नहीं सकते कि सरकार उनके भले की सोचेगी। अब सरकार कुछ भी कर ले पर वे टीका नहीं ही लगवाएंगे। बीस वर्षों में सरकार उन्हें पोलियो का ड्रॉप नहीं पिला सकी, तो आज क्या टीका लगवा पाएगी? नहीं...
    आपको क्या लगता है, इस देश की सारी जनसंख्या कभी भी इतनी जागरूक हो पाएगी कि कोई भी सरकार उन्हें अपनी हर बात समझा सके? आप मुझे नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कह लीजिये, पर सच यह है कि यह भीड़ कभी भी पूरी तरह जागरूक नहीं होगी। सौ वर्षों में भी नहीं... आप सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत को अस्सी लाख की संख्या वाले इजराइल के बगल में खड़ा नहीं कर सकते। कभी भी नहीं... गाँव के किसी जाहिल बूढ़े ने यदि एक बार कह दिया कि टीका में नसबंदी की दवा मिली है, तो उसका पूरा कुनबा उसी की बात पर टिका रहेगा। उन्हें सरकार की सारी मशीनरी लग कर भी नहीं समझा पाएगी। फिर उन मूर्खों में ऊर्जा खर्च कर से दूसरों की जान जोखिम में क्यों डाली जाय?
     किसी भी वस्तु के वितरण का सही ढंग यही है कि वस्तु पहले उन्हें दी जाय जो उसकी उपयोगिता समझते हैं। जो उपयोगिता नहीं समझते हैं वे उस वस्तु को नष्ट ही करेंगे। भरोसा नहीं होता तो किसी गाँव में ठेके पर बने सरकारी अनुदान वाले शौचालयों की दशा देख लीजिये, आधे से अधिक उजड़ गए हैं और शेष में जलावन रखते हैं लोग... यही समाज का सच है मित्र!
     टीका तो खैर महीने दो महीने में सबको लग ही जायेगा, पर सबको साथ ले कर चलने की बेकार जिद्द बहुत हानि पहुँचाएगी। जो आपके साथ चलना नहीं चाहता, वह कभी भी साथ नहीं चलेगा। आप कुछ भी कर लीजिए साहब, सच यही है।

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