जमुई जिले के सोनो प्रखंड के एक छोटे से गांव बलथर के रहने वाले नवनीत सिंह. जो वर्तमान में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में पीएचडी (हिंदी साहित्य विभाग) के शोधार्थी हैं. इन्होंने हिंदी भाषा तथा अंगिका भाषा में कई सारी रचनाएं की हैं. अंगिका तथा हिन्दी में इनका योगदान और भी बाकी हैं. खैर इनके व्यक्तित्व पर चर्चा फिर कभी फिलहाल इन्होंने आदमखोर कोरोना नाम की भीषण आपदा में लड़ रहे सभी योद्धाओं को समर्पित अपनी कविता 'लड़े हुए योद्धा' हमारे 'अंग रिपब्लिक' के जरिए साझा किया.
'लड़े हुए योद्धा'/नवनीत सिंह
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एक समय बाद
हम लड़े हुए योद्धा
याद आएंगे...
तुम्हें हम याद आएंगे
जब तुम अपने बच्चों को
सुनाओगे विपद काल में
वायरस से की गई अपनी
संघर्ष गाथा...
तब हम याद आएंगे
कि उसके सामने कैसे लड़े हम....
हम याद आएंगे कि
जब तुम घर में महीनों बंद हो गए थे;
देश और दुनिया से खींच लिए थे अपने हाथ...
जब नदियों के तटबंध टूट रहे थे
जब टूट रही थी तुम्हारी उम्मीदें...
जब अलग हो रहे थे-
गांव और शहर,
देहरी और डगर,
घरों और दुकानों के बीच
जब महामारी का साया था;
तब इन दूरियों को
जोड़े रहे हम...
इन सबके भार
महीनों कांधे पर ढोए हमने!
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उपरोक्त कविता में भाई नवनीत सिंह जी ने उस दिन की कल्पना प्रस्तूत की है जब ये आपदा टल चुकी होगी और हम सब ये कहानी अपने नाती पोतों को सुना रहे होंगे कि किस तरह से हमारे डाक्टर, नर्स, पुलिस, आर्मी, रिपोर्टर्स आदि ने मिलकर विजय पाई थी!
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